फांसी से ठीक पहले भगत सिंह द्वारा लिखी एक क्रांतिकारी खत की पूरी कहानी

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फांसी से ठीक पहले भगत सिंह द्वारा लिखी एक क्रन्तिकारी खत की पूरी कहानी

“लिख रहा हूं मैं अंजाम, जिसका कल आगाज आएगा… मेरे लहू का हर एक कतरा, इंकलाब लाएगा… मैं रहूं या न रहूं पर, ये वादा है मेरा तुझसे… मेरे बाद वतन पर, मरने वालों का सैलाब आएगा…..”

ये बस एक शेर नहीं, ये हौसला है… ये पंक्तियां नहीं ललकार है… ये वो चित्कार थी, जिसने अंग्रेजी हुकूमत के पांव तले ज़मीन थर्रा दी थी. ये वो मां भारती का शेर था जिसकी दहाड़ ने देश के युवाओं में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ क्रांति की ज्वाला भड़काई थी. ये वो शूरवीर नौजवान था जो छोटी सी उम्र में ही कुर्बान हो गया.

ये किस्सा है, अमर शहीद सरदार भगत सिंह का. तारीख गवाह है कि, उन्होंने मौत को इस मोहब्बत से गले लगाया कि छोटी सी जिन्दगी भी, उन पर फक्र करने लगी थी. जिन्दगी ही क्यूं, उसकी शहादत की लौ ने पूरा हिन्दुस्तान जश्न-ए-आज़ादी के चिराग से रौशन हो उठा था…फांसी से ठीक पहले भगत सिंह द्वारा लिखी एक क्रांतिकारी खत की पूरी कहानी

गुलामी के जंजीरों में जब जकड़ा था हिंदुस्तान

हिन्दुस्तान गुलामी के जंजीरों में जकड़ा हुआ था. अंग्रेजों के खिलाफ लगातार आवाज़ भी उठने लगी थी. 1857 की क्रांति अधुरी रह गई थी और उस अधुरी क्रांति को एक नए मुकाम तक पहुंचने वाला पैदा हो चुका था. साल 1907 का था, महिना सितंबर का. जब पंजाब के एक छोटे से गांव में सरदार किशन सिंह के घर एक बच्चा पैदा हुआ. आने वाले वक्त में इस बच्चे ने इतिहास के पन्ने पर शहादत का वो अध्याय लिखा. जो जंग-ए-आज़ादी की कोई भी कहानी, इस अध्याय के बिना पूरी नहीं हो सकती थी.

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घरवालों ने इस बच्चे का नाम भगत सिंह रखा. दूनिया इन्हें शहीद-ए-आजम भगत सिंह के नाम से जानती है. भगत सिंह के लालन-पालन क्रांतिकारी विचारों के बीच हुआ था. वो जब सात साल के थे तो अपने चाचा की पिस्तौल लेकर खेत में छिपा आए थे. जब चाचा अजित सिंह ने पकड़ा और पूछा की वे बचपन से क्रांतिकारी जुनून, निडरता और हौसला भगत सिंह में कूट-कूट कर भरा था…

जालियांवाला बाग हत्याकांड से आहत थे भगत सिंह

बैसाखी का दिन था. उस दिन अमृतसर में मेला लगा था. सैकड़ों साल से मेला लगने का परंपरा चला आ रहा था, जिसमें उस दिन भी हज़ारों लोग दूर-दूर से मेला देखने अमृतसर आए थे. ठीक उसी दिन अमृतसर के जालियांवाला बाग में एक सभा रखी गई थी. तभी ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर 90 ब्रिटीश सैनिकों को लेकर वहां पहुंच गया और फिर निहत्थे लोगों पर गोलियां चलानी शुरू कर दी. उस वाक्य ने भगत सिंह को झकझोर दिया.

Jallianwala Bagh Massacre
Jallianwala Bagh Massacre

भगत सिंह करीब 12 साल के थे जब जालियांवाला बाग हत्याकाण्ड हुआ था. जिस वक्त भगत सिंह स्कूल की छोटी सी कक्षा में बैठे पढ़ाई कर रहे थे, उस वक्त पंजाब के एक दूसरे जिले में अंग्रेज़ी हुकूमत के ज़ुल्म गोलियां बन कर बरस रहे थे और लहुलुहान हो रही थी अमृतसर नगरी, जिसकी पहचान अब तलक महज़ एक धार्मिक-नगरी तक ही सीमित थी. इस भीषण गोलीकांड ने सैकड़ों ज़िंदगियां निगल ली थीं. मरने वालों में नौजवान भी थे, बुज़ुर्ग भी थे, महिलाएं और मासूम बच्चे भी थे.

मौत के आगोश में समाते-समाते उनकी दर्दभरी चीखों ने उस वक्त पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था. जिसने एक 12 साल के बालक को भी आहत किया था. वो बालक कोई और नहीं नन्हा सरदार भगत सिंह था. गोलियों की तड़तड़ाहट ने उसे कुछ यूं झकझोरा था, कि वो 12 मील पैदल चल कर जलियांवाला की उस रक्त-रंजित ज़मीं तक जा पहुंचा, जहां अंग्रेज़ों ने खून की होली खेली थी.

जालियांवाला बाग पहुंचते ही भगत सिंह के मन में क्रांति के लपटें उठने लगी थीं. इसी बीच देश में असहयोग आंदोलन ने भी ज़ोर पकड़ने लगा था. भगत सिंह को लगा की ये आंदोलन जगं-ए-आज़ादी के लिए एक अहम हथियार साबित होगी. लेकिन फरवरी 1922 में चौरी-चौरा कांड के बाद गांधीजी ने वो आंदोलन वापस ले लिया.

इस घटना ने भगत सिंह के अंदर क्रांतिकारी को मानो झकझोर दिया. भगत सिंह को लगा की गांधी जी का ये फैसला आज़ादी की लड़ाई में बड़ी भूल साबित हो सकती है और यहीं से भगत सिंह एक नई राह पर निकल पड़े..

“दहर से क्यों ख़फ़ा रहें, चर्ख़ का क्या गिला करें, सारा जहाँ अदू सही, आओ! मुक़ाबला करें “

लाहौर में जब जॉन सॉन्डर्स को गोली मारी भगत सिंह ने

भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव, इन तीनों क्रांतिकारीयों ने 1928 के दौरान लाहौर में एक ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जॉन सॉन्डर्स की गोली मारकर हत्या कर दी थी. इस हत्या से अंग्रेजी हुकूमत जैसे बौखला गया था. लेकिन इन तीनों क्रांतिकारियों ने एक बार फिर से अंग्रेजों को दहलाया.

सेंट्रल असेंबली ह़ॉल में बम फेंक दिया. असेंबली हॉल में बम फेंकन की नसीहत उनके करीबी दोस्त सुखदेव ने दी थी. हालांकि हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन की ओर से असेंबली हॉल में बम फेंकने के लिए बटुकेश्वर दत्त के साथ किसी दूसरे व्यक्ति को नियुक्त किया गया था. लेकिन सुखदेव ने भगत सिंह को कायर और डरपोक कह डाला. उसी वक्त भगत सिंह ने असेंबली हॉल में बम फेंकने का निर्णय लिया और फिर बहुत ही निर्भीकता से असेंबली में बम फेंक भी दिया.

भगत सिंह को सेंट्रल असेंबली ह़ॉल में बम फेंकने के कारण अंग्रेजी पुलिस ने गिरफ्तार किया. जैसे ही देश में लोगों को पता चला कि भगत सिंह अंग्रेजी पुलिस के हाथ पकड़े गए हैं मानों देश में एक गुस्से का महौल बन गया था. भगत सिंह का जज्बा उस कैद में भी जिंदा था. भगत सिंह ने जेल के अंदर से आंदोलन छेड़ा. अंग्रजों ने उन पर जमकर जुल्म ढाए लेकिन भगत सिंह का संकल्प नहीं हिला.

फांसी से ठीक पहले भगत सिंह द्वारा लिखी एक क्रन्तिकारी खत

फांसी से 20 दिन पहले भगत सिंह ने अपने भाई को एक खत में लिखा था. उन्हें यह फ़िक्र है हरदम, नई तर्ज़े-जफ़ा क्या है?  हमे यह शौक़ है देखें, सितम की इन्तेहा क्या है? आखिरकार भगत सिंह के आगे अंग्रेजी हुकूमत को झुकना पड़ा. क्रांतिकारी कैदियों को सारी मूलभुत सुविधा मुहैया कराई गई. भगत सिंह लिखना और पढ़ना चाहते थे और उन्हें पढ़ने और लिखने की आज़ादी भी मिली…

Bhagat Singh letter to hi brother Jagat Singh
Bhagat Singh letter to hi brother Jagat Singh
Bhagat Singh letter from Central Jail
Bhagat Singh letter from Central Jail

वो मनहूस दिन जब भगत सिंह को दी गई थी फांसी

लाहौर सेंट्रल जेल में 23 मार्च 1931 की शुरुआत, किसी और दिन की तरह ही हुई थी. फ़र्क सिर्फ़ इतना सा था कि सुबह-सुबह ज़ोर की आँधी आई थी. लेकिन, वो आंधी देश के लिए और भगत सिंह के लिए मनहूस साबित होने जा रहा था.

भगत सिंह की ज़िन्दगी की चिराग बुझाने की तैयारी चल रही थी. भगत सिंह पर पुलिस ऑफिसर सॉन्डर्स की हत्या का केस चल रहा था और सबको पता था कि सजा कितनी कड़ी होगी. पिता ने सरकार से रहम की अपील भी की लेकिन अंग्रेजी हुकूमत ने जो तय किया था वही हुआ. भगत सिंह के मुस्तकबील पर सजा-ए-मौत की मुहर लग गई थी. फांसी की तारीख मुकदर हुई थी.

लाहौर जेल का जेलर चतर सिंह को आदेश मिला की फांसी पहले दी जाएगी. चतर सिंह भी हैरान था. बाकी कैदियों को जल्दी बैरक में डालकर चतर सिंह भगत सिंह के पास पंहुचा. भगत सिंह तब लेनन के एक किताब पढ़ रहे थे. बोले थोड़ा रूकिये एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से मिल रहा है.

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वो रात भी कितनी मनहूस थी, जब भगत सिंह को फांसी देने के लिए तैयारियां शुरु कर दी गई थी. वो मनहूस दिन 23 मार्च 1931 का था, और शाम के 7 बज रहे थे. जब भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव को फांसी दे दी गई. आनन-फानन में तीनों के शवों को सतलुज के किनारे ले जाकर उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया.

“कोई दम का मेहमान हूँ, ए-अहले-महफ़िल, चरागे सहर हूँ, बुझा चाहता हूं. भगत सिंह का शरीर उस रोज नहीं रहा. लेकिन, उनके विचारों का चिराग आज भी हिन्दुस्तान को रौशन किया हुआ है. वही चिराग जिसे इंकलाब कहते हैं.”

 

Author: Team The Rising India

Keywords: Bhagat Singh, 23 March 1931, Bhagat Singh Letter to his brother

2 COMMENTS

  1. […] देश में दीपावली की तैयारियां शुरू हो ग…. सभी को 4 नवंबर का इंतजार है जब घर-घर जाकर मां लक्ष्मी की पूजा की जाएगी. पटाखों के बिना दिवाली के त्योहार की कल्पना नहीं की जा सकती. दिवाली के पटाखों के साथ-साथ प्रदूषण और शारीरिक बीमारी लोगों काफी बुरा हाल रहता है. इससे जुड़ा एक मैसेज सोशल मीडिया पर चल रहा है. इस दीपावली अस्थमा बढ़ाने वाले जहरीले पटाखे भेज रहा चीन? […]

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