अंग्रेज़ो को ‘नानी याद दिलाने’ वाले अशफ़ाक़ुल्लाह खां गाँधी से क्यूँ नाराज़ थे?

3
341
अंग्रेज़ो को 'नानी याद दिलाने' वाले अशफ़ाक़ुल्लाह खां गाँधी से क्यूँ नाराज़ थे

“कभी तो कामयाबी पर मेरा हिंदुस्तान होगा. रिहा सैयद के हाथों से अपना आशियाँ होगा”. ये लाइन्स हममे से कुछ ही लोगो ने सुनी होगी. अहिंसा के मार्ग में चलने वाले महात्मा गाँधी या अंग्रेज़ो को नाको चने चब्वाने वाले हमारे वीर भगत सिंह के कहे नारे तो सबने सुने ही होंगे पर कुछ स्वतंत्रता सेनानी ऐसे भी है जिनके बारे में हम बहोत कम या फिर कुछ नहीं जानते हैं. अंग्रेज़ो को ‘नानी याद दिलाने’ वाले अशफ़ाक़ुल्लाह खां गाँधी से क्यूँ नाराज़ थे?

अंग्रेज़ो को 'नानी याद दिलाने' वाले अशफ़ाक़ुल्लाह खां गाँधी से क्यूँ नाराज़ थे? Click To Tweet

आज हममे से कई लोग देशप्रेम को धर्म से जोड़ कर ही बताते हैं. किसी का नाम या कपडे देखकर हम उन्हें देशप्रेमी या देशद्रोही घोषित कर देते हैं, लेकिन जब हमारे देश को अंग्रेज़ो से आज़ादी नहीं मिली थी तब शायद आलम ये नहीं था. 

एक भारत एक हिंदुस्तान

“वो जिस्म भी क्या जिस्म है जिसमे न हो खूने-जूनून, क्या लड़े तूफानों से जो कश्ती-ऐसाहिल में है…

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है जोर कितना बाजु-ए-कातिल में है”

ये कानो को सुकून देने वाली सुप्रसिद्ध लाइन्स देश के लिए अपनी जान कुर्बान कर देने वाले हमारे स्वतंत्रता सेनानी अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ाँ की है. जिन्होंने जात पात, धर्म से ऊपर उठ कर हमारे आज की स्वतंत्रता के लिए अपनी पूरी ज़िन्दगी अंग्रेज़ो के खिलाफ संघर्ष किया.  

आज के उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में जन्म लेने वाले अशफ़ाक़ुल्लाह अपने परिवार में 4 भाइयों में सबसे छोटे थे. राम प्रसाद बिस्मिल उनके बड़े भाई के सहपाठी थे जिनसे वो बहोत करीब थे. उन्हें शायरी लिखने का शौख भी बचपन से ही था, बचपन से ही देश के प्रति अत्यधिक निष्ठा और प्रेम था.

शायराना अंदाज़

अशफ़ाक़ुल्लाह खां हिंदी और उर्दू शायरियो के काफी शौक़ीन थे. एक दिलचस्प बात ये है की वो अपनी शायरी अपने दोस्त राम प्रसाद बिस्मिल को सबसे पहले सुनाते थे. उन्होंने कई लेख लिखे जिनमे से एक प्रसिद्ध ये भी है 

“किये थे काम हमने भी जो कुछ भी हमसे बन पाए,

ये बातें तब की हैं आज़ाद थे और था शबाब अपना;

मगर अब तो जो कुछ भी हैं उम्मीदें बस वो तुमसे हैं,

जबां तुम हो, लबे-बाम आ चुका है आफताब अपना”

इन तरह के कई लेख अशफ़ाक़ुल्लाह खान के फॉलोअर्स ने उनकी शहादत के बाद भी स्वतंत्रता मोर्चों  में जारी रखे. 

नया रास्ता

वैसे तो अशफ़ाक़ुल्लाह खान गाँधी जी के विचारो से काफी प्रेरित थे. अंग्रेज़ो को ‘नानी याद दिलाने’ वाले अशफ़ाक़ुल्लाह खां गाँधी से क्यूँ नाराज़ थे?

1922 में जब महात्मा गाँधी ने अहिंसा आंदोलन वापस लिया तो अनगिनत युवाओ की तरह अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ा को भी इस बात से नाराज़गी थी. इसी के बाद उन्होंने समान विचारों वाले स्वतंत्र सेनानियों के साथ मिलकर भारत को आज़ादी दिलाने का अपना अलग रास्ता चुन लिया और 1924 में हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन का गठन किया. इन्हीं दिनों अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ाँ और राम प्रसाद बिस्मिल काफी अच्छे दोस्त बन गए और एक जैसे विचारों के होने के कारण आगे भी साथ ही आगे बढ़े.

काकोरी कांड:

भारत को अंग्रेज़ो के चंगुल से आज़ाद करने के लिए अशफ़ाक़ुल्लाह खान और उनका संगठन लगातार कार्यरत था. बहुत प्रयासों के बाद भी जब अंग्रेज़ो ने इनके किसी आग्रह को नहीं माना. अपने एसोसिएशन और आंदोलन को मजबूत करने के लिए उन्हें हथियारों और मुद्राकोष की जरुरत होने लगी. इसी को पूरा करने उन्होंने अन्य स्वतंत्रता सेनानी जैसे की राम प्रसाद बिस्मिल, चंद्र शेखर आज़ाद और कई और भी क्रांतिकारियों के साथ सरकारी ख़ज़ाने ने भरी ट्रैन को लूट लिया.

गाँधी से नाराज़ अशफ़ाक़ुल्लाह अपने अन्य कान्तिकारी साथिओं के साथ मिल कर अंग्रेजों से लड़ाई लड़ रहे थे. ‘काकोरी काण्ड’ कहा गया क्योंकि यह घटना लखनऊ के पास काकोरी जगह की है. इसके बाद से उन्हें ब्रिटिश हुकूमत ढूंढती रही और कुछ महीनो बाद दग़ाबाज़ी के कारण उनकी छिपने की जगह का पता चलने पर अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया.

फुट डालो शासन करो : 

जेल में कैद उन्हें सरकारी गवाह बनाने के कई प्रयास किये गए ताकि उनके अन्य साथियों का भी पता चल सके. उन्हें भारत को हिंदू राज्य होने का भय दिखाया गया पर उन्होंने जवाब में कहा “तुम लोग हिन्दू-मुसलमानों में फूट डालकर आजादी की लड़ाई को नहीं दबा सकते. हिंदुस्तान में क्रांति की ज्वाला भड़क चुकी है जो अंग्रेजी साम्राज्य को जलाकर राख कर देगी. हिंदुस्तान आज़ाद हो कर रहेगा. अपने दोस्तों के खिलाफ मैं सरकारी गवाह बिल्कुल नहीं बोलूंगा” 

ब्रिटिश हुकूमत के अत्यधिक प्रयासों के बाद भी जब वो नहीं माने गए तो उनके मुक़दमे को आगे बढ़ा कर उन्हें और उनके दोस्तों को मृत्यु दंड दे दिया गया. फांसी की सजा के परिणाम स्वरूप 19 दिसंबर 1927 को महज़ 27 साल की उम्र में उनकी मृत्यु हो गयी.

शहीद होने के बस एक रात पहले भी अशफ़ाक़ुल्लाह खान की लिखी एक शायरी से उनकी दोस्ती की गहराई और देश प्रेम का पता लगता है … Click To Tweet

उसी दिन उनके दोस्त और क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल को भी एक अलग कारावास में फांसी पर लटका दिया गया. यह घटना सोच कर भी आँखों में वो चित्र और मन में घोर निराशा भर आती है. अशफ़ाक़उल्ला खान और राम प्रसाद बिस्मिल की दोस्ती मृत्यु तक अटूट रही.

शहीद होने के बस एक रात पहले भी अशफ़ाक़ुल्लाह खान की लिखी एक शायरी से उनकी दोस्ती की गहराई और देश प्रेम का पता लगता है। 

“जाऊँगा खाली हाथ मगर ये दर्द साथ ही जाएगा, जाने किस दिन हिन्दुस्तान आज़ाद वतन कहलायेगा?

बिस्मिल हिन्दू है कहते हैं “फिर आऊंगा फिर आऊंगा, फिर आकर ऐ भारत माँ तुझको आज़ाद कराऊंगा। 

जी करता है मै भी कह दूँ पर मजहब से बंध जाता हूँ, मै मुसलमान हु पुनर्जन्म की बात नहीं कर पाता हूँ

हाँ खुदा अगर मिल गया कही अपनी झोली फैला लूंगा, और जन्नत के बदले उससे एक पुनर्जन्म ही मांगूंगा”

Author : Team The Rising India

Keywords : Ashfaqulla khan, Ram Prasad Bismil, Hindustan Republican Association, Kakori Kand, Gandhi, Freedom Fighter

3 COMMENTS

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here