‘मारो फिरंगी’ का नारा, फांसी और अमर शहीद मंगल पांडेय!

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‘मारो फिरंगी’ का नारा, फांसी और अमर शहीद मंगल पांडेय!

देश में आजादी की लड़ाई का पहली बार शंखनाद करने वाले अमर शहीद मंगल पांडेय की आज 194वीं जयंती है. पूरा देश आज मां भारती के उस वीर सपूत को याद कर रहा है. जो देश के लिए हमेशा से गौरव महसूस कराया. एक ऐसा वीर सपूत जो देश के लिए, ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ पहली सशस्त्र क्रांति का बिगूल फूंका था और वीरगति को प्राप्त हुए थे. ‘मारो फिरंगी’ का नारा, फांसी और अमर शहीद मंगल पांडेय को जानते हैं!

आज का दिन इतिहास के पन्नों में हमेशा-हमेशा के लिए सुनहरे अक्षरों में दर्ज है. वहीं, वीर सपूत मंगल पांडे की इस साहस को पूरे देश आज सलाम कर रहा है. देश के हर कोने-कोने से कई नेताओं ने उनको विनम्र श्रद्धांजलि देते हुए याद किया है.

ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफा खोला मोर्चा

एक ऐसी क्रांति जिसका दमन करने में ब्रटिश हुकूमत को पसीना छूट गया और जिसकी राख में दबी चिंगारी कभी ठंडी न हो सकी और एक दिन ब्रिटीश हुकूमत को यहां से जाना ही पड़ा. हालांकि हमारे इतिहास में शहीद मंगल पांडे को बहुत अहम स्थान नहीं दिया गया.

लेकिन, कहा तो यह भी गया, कि उन्होंने समय से पहले क्रांति की शुरुआत करके क्रांतिकारियों की योजना पर पानी फेर दिया. नहीं तो, पूरे देश में एक साथ क्रांति की ज्वाला धधकती, जिसमें अंग्रेजों को सौ साल पहले ही देश छोड़ कर जाना पड़ता. ये वही दौर था, जब लखनऊ में लगभग दस महीने से क्रांतिकारियो ने अंग्रेजों से मोर्चा लिया था और जिसकी निशानी रेजीडेंसी में आज भी मौजूद है.

‘मारो फिरंगी’ नारा, जिसके रास्ते अंग्रेजों के खिलाफ फूंका बिगूल

मंगल पांडे ने एक नारा दिया था. जिस नारे का नाम था ‘मारो फिरंगी’. इस नारा को देते समय मंगल पांडे ने ठान लिया था, कि ब्रिटिश हुकूमत के जड़ से उखाड़ फेंकना है. उस नारे के साथ उन्होंने अपने वीरता से क्रांति के उद्घोष की उपलब्धि में बदला और सीधा विद्रोह के रास्ते पर चल पड़े.

हालांकि, वो रास्ते चुनौतियों से भरी हुई थी. लेकिन, मंगल पांडे कोई मामूली से व्यक्तित्व वाले इंसान नहीं थे. उनके विचारों ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ हमेशा से क्रांति की ज्वाला भड़काती रही. और उसी पड़ाव पर मंगल पांडेय आ खड़े थे.

साल 1857 का था और महिना मार्च का, जब मंगल पांडे की ओर से अंग्रेजों के खिलाफ भड़की ज्वाला फिर बुझी नहीं. मेरठ की छावनी में बगावत हो गयी. बगावत के दौरान ही ये ज्वाला पूरे उत्तरी भारत में फैल गया. जिससे अंग्रेजों को स्पष्ट संदेश मिल गया, कि अब भारत पर राज्य करना उतना आसान नहीं है, जितना वे समझ रहे थे. इसके बाद ही हिन्दुस्तान में चौंतीस हजार सात सौ पैंतीस अंग्रेजी कानून यहां की जनता पर लागू किये गये. ताकि, मंगल पाण्डेय सरीखा कोई सैनिक दोबारा भारतीय शासकों के विरुद्ध बगावत न कर सके.

छोटी सी उम्र में बंगाल इन्फैंट्री की छठी कंपनी में किया काम

मंगल पांडे 34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री (बीएनआई) का हिस्सा थे, जो ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का हिस्सा था. वह इसमें सिपाही के तौर पर तैनात थे. उन्होंने 18 साल की छोटी उम्र में बंगाल इन्फैंट्री की छठी कंपनी में काम करना शुरू कर दिया था. मंगल पांडे का जन्म एक साधारण भूमिहार ब्राह्मण परिवार में हुआ था. उनका परवरिश आम बालक के तौर पर ही हुआ था. लेकिन कौन जानता था कि मंगल पांडे आगे चलकर अंग्रेजों के खिलाफ जंग-ए-आज़ादी का ऐलान करेंगे.

बहरहाल, मंगल पांडे के साथ यह विद्रोह कारतूसों के इस्तेमाल को लेकर भड़का था. जो कि जाहिर तौर पर गाय और सुअर की चर्बी से बनाया गया था. हालांकि, कारतूस को अपने दांतों से फाड़ने की जरूरत पड़ती थी, इस मुद्दे ने विवाद की शुरुआत की.

भारतीय सैनिकों ने हिंदुओं और मुसलमानों के एक ऐसे धारणा को छोड़ दिया. जो हमेशा से धार्मिक कारणों से प्रतिबंधित था. दरअसल, मंगल पांडे एक हिन्दू ब्राह्मण थे, जिसके वजह से उन्होंने धार्मिक गतिविधियों को हमेसा से पालन किया.

वहीं, उन्होंने एक विद्रोह के समूह को नेतृत्व किया. जिसमें सेना के काम के हिस्से के रूप में ऐसे कारतूसों के इस्तेमाल किया जाता था. लेकिन उन्होंने इस कारतूसों को इस्तेमाल करने से इनकार किया. कई लोगों ने इसे भूमिहार ब्राह्मण होने के कारण हुए विद्रोह के रूप में आकलन किया. लेकिन, यह उनकी गहरी प्रकृति थी जिसने उन्हें अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने को खड़ा किया.

मंगल पांडेय और फांसी,

एक दमदार व्यक्तित्व से पहचान रखने वाले मंगल पांडेय अंग्रेज को मारने की कसम खाई थी. बैरकपुर में विद्रोह के साथ जो शुरू हुआ, वह जल्द ही मेरठ, दिल्ली, कानपुर और लखनऊ में फैल गया.  मंगल पांडे को बाद में ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह में उनके कार्यों के लिए गिरफ्तार कर लिया गया. और सैन्य अदालतों में उन पर मुकदमा चलाया गया, जहां उनसे कई मोर्चों पर पूछताछ की गई.

वहीं, मंगल पांडे से उन अपराधियों के नाम बताने के लिए कहा गया, जिन्होंने इस लड़ाई में भाग लिया था. हालांकि मंगल पांडेय इस बात पर बड़े ही गंभीरता से चुप्पी साधे रखी और अंत में 6 अप्रैल 1857 को उन्हें मौत की सजा सुनाई गई. फांसी 18 अप्रैल 1857 को फांसी दी जानी थी. लेकि‍न, अंग्रेजों की ओर से मंगल पांडे को दस दिन पहले ही 8 अप्रैल 1857 को फांसी दे दी गई.

यह सज़ा कोई आम नहीं थी, बल्कि एक क्रांतिकारी की सज़ा थी. मौत के सजा को सुनते पूरा देश उबल रहा था. लेकिन, फैसला आखिरकार जालिम कोर्ट के तरफ से किया गया था. अंतत: उस फैसले को स्वीकार करते हुए मंगल पांडे ने खुशी-खुशी फंदे पर लटक गए और आखिरी संदेश देशवासियों को दे गए कि “अगर इस तरह से कोई भी हमारे सब्र को छेड़ेगा तो उसे हम छोड़ेंगे नहीं”. ‘मारो फिरंगी’ का नारा, फांसी और अमर शहीद मंगल पांडेय कि यह थी एक छोटी सी रोचक और क्रांतिकारी कहानी!

Author: The Rising India Team

Keywords: Mangal Pandey, Sepoy Mutiny, 1857 War of Independence, Maro Firangi, Indian Freedom Movement

2 COMMENTS

  1. […] चंद्रशेखर आजाद (Chandra Shekhar Azad) का जन्म 23 जुलाई, 1906 को मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले के भाबरा नामक स्थान पर हुआ था. चंद्रशेखर आजाद का जन्म एक साधारण परिवार में हुआ था. वो बचपने के दिनों से ही एक तेज तरार और होनहार छात्र थे. 14 वर्ष की आयु में बनारस गए और वहां एक संस्कृत पाठशाला में पढ़ाई की. वहां उन्होंने कानून भंग आंदोलन में योगदान दिया था. लेकिन तब  कोई क्या जानता था कि चंद्रशेखऱ आज़ाद एक महान क्रांतिकारी बनेंगे. […]

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