जब अपने ही लोगों कि बर्बरता के शिकार नेल्सन मंडेला ने किया गाँधी को याद

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Mandela, Gandhi and The Struggle

‘जीवन को ऐसे जियो कि जैसे कोई देख नहीं रहा हो और अपने आप को व्यक्त ऐसे करो कि जैसे हर कोई सुन रहा हो’. ये विचार, ये आत्मविश्वास, शब्दों में झलकता दृढ़ संकल्प ये किसी और का नहीं है बल्कि शांति के दूत्त कहे जाने वाले नेल्सन मंडेला का है. जब अपने ही लोगों कि बर्बरता के शिकार नेल्सन मंडेला ने किया गाँधी को याद.

'सुविधाएं कम थीं पर हमारे सपनों में कमी नहीं थी', नेल्सन मंडेला Click To Tweet

मंडेला का ये विचार ऐसा लगता है कि मानो जिंदगी में कितनी सहजता होनी चाहिए. दरअसल, नेल्सन मंडेला ने पूरी दुनिया में रंगभेद, नस्लभेद जैसे कई विरोध के वैश्विक प्रतीक माने जाते हैं. अपने विचारों से मंडेला ने ऐसे क्रांति की है कि पूरी दूनिया शांति के मसिहा के नाम से जानती हैं.

मंडेला अपने विचारों पर अडिग थे

नेल्सन मंडेला अपने कार्यों से इस तरह विख्यात है कि उनका परिचय किसी का मुहताज नहीं. मंडेला दक्षिण अफ्रीका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति थे. इसके साथ ही इससे पहले वे “अफ़्रीकी नेशनल कांग्रेस” और उसके सशस्त्र गुट “उमखोंतो वे सिजवे” के अध्यक्ष थे. ये अफ़्रीका में रंगभेद विरोधी संगठन थे. हालांकि, इसी रंगभेद विरोधी संघर्ष के कारण नेल्सन मंडेला को 27 साल जेल में काटना पड़ा. जब अपने ही लोगों कि बर्बरता के शिकार नेल्सन मंडेला ने किया गाँधी को याद और फिर भी नेल्सन मंडेला खुद को कभी हारा हुआ महसूस नहीं किया.

उनका हमेशा से कहना था कि ‘आप किसी काम में तभी सफल हो सकते हैं जब आप उस पर गर्व करें’. ये विचार उनका इतना सशक्त था कि उन्हें अपने कदम से डगमगाया नहीं.  गौरतलब है, कि नेल्सन मंडेला अफ्रीका के राष्ट्रपति बने, और उसके बाद एक अलग राष्ट्र दक्षिण अफ्रीका की स्थापना की. इसके बाद नेल्सन मंडेला ने पूरे विश्व में रंगभेद का विरोध किया. मंडेला के कई उपनामों से जाना जाता है. दलितबुंगा हो या फिर शांति के मसिहा जैसे कई उपनाम है जो आज भी लोगों के बीच विख्यात है.

रंगभेद ने पहुंचाई गहरी चोट

यह वो दौर था, जब दक्षिण अफ्रीका में अश्‍वेत लोगों को आम लोगों के साथ बैठकर क्रिकेट मैच देखने की अनुमति भी नहीं थी. जब अश्‍वेत लोगों के लिए स्टेडियम में कंटीले तार वाले पिंजरे रखे गए थे. जिनमें बैठकर ही वे मैच देखा करते थे.

उन्‍हें काफी पहले से इसका एहसास था कि अश्वेत लोगों के प्रति दुराग्रह की जड़ें दक्षिण अफ्रीकी समाज में बहुत गहरी हैं. इन घटनाओं ने उन्‍हें ऐसी गहरी चोट पहुंचाई. अंतत: उन्‍होंने इसे खत्‍म करके ही दम लिया. मंडेला ने रंगभेद के खिलाफ आवाज उठाई, और उन्हें जेल जाना पड़ा. लेकिन, उन्होंने गोरे और काले के बीच खींची रेखा को मिटाकर ही माना.

गिरफ्तारी में थी महत्वपूर्ण भूमिका

मंडेला को 1964 में सरकार के खिलाफ साजिश का दोषी ठहराते हुए. उम्र कैद की सजा सुनाई गई थी. जिसके बाद वह 27 साल तक जेल में रहे थे. इस दौरान 18 साल उन्‍होंने रोबेन आइलैंड जेल में बिताए, जो बाद में स्वतंत्रता का प्रतीक बन गई. एक रिपोर्ट के मुताबिक, मंडेला की 1962 में हुई गिरफ्तारी में अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए की अहम भूमिका थी.

दरअसल, यह वो दौर था, जब द्वितीय विश्‍वयुद्ध के बाद दुनिया दो ध्रुवों-अमेरिका, सोवियत संघ में बंटी हुई थी. अमेरिका को लगता था कि मंडेला सोवियत संघ के नियंत्रण में हैं. हालाकि, मंडेला को इसे ज्यादा नुकसान तो नहीं हुआ. लेकिन, लोगों उन्हें ज़रूर झेलनी पड़ी थी.

गांधीवाद से मिली प्रेरणा

दक्षिण अफ्रीका में रंग-भेद के खिलाफ जंग महात्‍मा गांधी के सत्‍याग्रह और अहिंसा से प्रेरित था. लेकिन ऐसा भी नहीं था कि वह हमेशा से इस विचारधारा का पालन करते थे. जब अपने ही लोगों कि बर्बरता के शिकार नेल्सन मंडेला ने हिंसक क्रांति का आह्वान किया था तब भी उन्हें गाँधी याद आए थे. मंडेला अच्छे से जानते और समझते थे कि गाँधी महज़ एक नाम नही बल्कि एक सोच है. यही एक कारण था कि गाँधी मंडेला कि लगभग हर सोच में शामिल रहते थे.

'सुविधाएं कम थीं पर उनके सपनों में कमी नहीं थी', नेल्सन मंडेला Click To Tweet

1961 में उन्होंने अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस की एक सशस्त्र शाखा का भी गठन किया था, जिसके वह कमांडर-इन-चीफ थे. उनका रूझान साम्यवादी विचारधारा की ओर भी था और वह क्यूबा के आन्दोलन से भी खासे प्रभावित थे. लेकिन गांधीवाद उनके लिए सबसे बड़ी प्रेरणा साबित हुआ.

जब उन्हें कई पुरस्कार से नावाजा गया था

मंडेला को कई पुरस्कार से नवाजा गया था. जैसे नोबेल शांति पुरस्कार, भारत रत्न, निशान-ए-पाकिस्तान और गांधी शांति पुरस्कार. इन सब पुरस्कारों से सम्मानित नेल्सन मंडेला जवानी के दिनों से एक प्रेरित इंसान थे. जब वो राष्ट्रपति थे तो एक महान नेता के तौर पर काम किया. 18 जुलाई 1918 को जन्मे नेल्सन मंडेला पूरे देश के लिए प्रेरणा बने.

जब वो लिखते थे तो मानो ऐसा लगता था कि अपने लिखावट से सब कुछ कह गए लेकिन अवमुन ऐसा होता नहीं था. वो लिखते हैं कि-

‘जोहानिसबर्ग में मैं शहरी बन गया था. मैंने स्मार्ट सूट पहने. मैं शानदार ओल्ड स्मोबाइल कार चलाता था और मुझे शहर की हर गली का रास्ता पता था. मैं रोजाना शहर के एक दफ्तर में भी जाता था. लेकिन असल में मैं दिल से देसी लड़का बना रहा और नीले आसमान, खुले मैदान और हरी घास के अलावा ऐसा कुछ भी नहीं था जो मेरी आत्मा को खुशी दे सके. सितंबर में, मुझ पर लगी पाबंदी हटाई गई तो मैंने अपनी आजादी का फायदा उठाने और राहत पाने का फैसला किया. मैंने तय किया कि ऑरेंज फ्री स्टेट की ओर जाऊंगा.’

मानो नेल्सन अपनी पूरी आत्मा कथा ही कह दि हो लेकिन ये तो एक उनकी छोटी सी फीलिंग थी

साहस, धैर्य से हाशिये के लोगों के नेता थे

मंडेला 1990 में जेल से रिहा किए गए और चार साल बाद 1994 में वह दक्षिण अफ्रीका के पहले अश्‍वेत राष्‍ट्रपति चुने गए. उन्होंने राष्ट्रपति के तौर पर अपना कार्यकाल पूरा किया और फिर पद छोड़ दिया. साल 2013 में 95 साल की उम्र में उनका निधन हो गया.

‘सुविधाएं कम थीं पर उनके सपनों में कमी नहीं थी’. अपने साहस, धैर्य, जनता से जुड़ाव, मानव मूल्‍यों के लिए संघर्ष की गाथा ने उहें उन्‍हें अफ्रीका ही नहीं, दुनियाभर के अश्वेत और हाशिये पर रह रहे लोगों का नेता बना दिया.

 

Author: Team The Rising India

Keywords: Nelson Mandela, Mahatma Gandhi, First Black President, South Africa, African National Congress

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