क्यूँ गाँधी को छोड़ चंद्रशेखर आजाद जुड़े भगत सिंह के साथ?

1
253

‘दुश्मन की गोलियों का, हम सामना करेंगे, आजाद ही रहे हैं, आजाद ही रहेंगे.’ एक ऐसा नारा जो हमें बेहिसाब आगे ले जाने और हर हाल में लड़ने को प्हैरेरित करता है. ये नारा किसी आम इंसान का दिया हुआ नहीं बल्कि एक महान क्रांतिकारी और स्वतंत्रता सैनेनी चंद्रशेखर आजाद का है. चंद्रशेखर गांधी से प्रेरित थे फिर क्यूँ गाँधी को छोड़ द्रशेखऱ आज़ाद जुड़ गए भगत सिंह और बिस्मिल के साथ? जानते है इसका जवाब और पूरी कहानी!

क्यूँ गाँधी को छोड़ चंद्रशेखर आजाद जुड़े भगत सिंह के साथ? Click To Tweet

होनहार छात्र थे चंद्रशेखऱ आज़ाद

चंद्रशेखर आजाद (Chandra Shekhar Azad) का जन्म 23 जुलाई, 1906 को मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले के भाबरा नामक स्थान पर हुआ था. चंद्रशेखर आजाद का जन्म एक साधारण परिवार में हुआ था. वो बचपने के दिनों से ही एक तेज तरार और होनहार छात्र थे. 14 वर्ष की आयु में बनारस गए और वहां एक संस्कृत पाठशाला में पढ़ाई की. वहां उन्होंने कानून भंग आंदोलन में योगदान दिया था. लेकिन तब  कोई क्या जानता था कि चंद्रशेखऱ आज़ाद एक महान क्रांतिकारी बनेंगे.

साल 1920-21 में वे गांधीजी के असहयोग आंदोलन से जुड़ गए और गिरफ्तार भी हुए. फिर क्यूँ गाँधी को छोड़ चंद्रशेखऱ आज़ाद जुड़ गए भगत सिंह और बिस्मिल के साथ? जज के समक्ष उन्हें जब पेश किया गया तो उन्होंने अपना नाम ‘आजाद’, पिता का नाम ‘स्वतंत्रता’ और ‘जेल’ को अपना निवास बताया. इस शब्द से ऐसा लग रहा है कि चंद्रशेखऱ आज़ाद कभी भी परिस्थितियों के आगे नगमस्तक नहीं हुए.

आज़ाद को जब 15 कोड़ों की सुनाई गई सजा

चंद्रशेखऱ आज़ाद को 15 कोड़ों की सजा दी गई. हर कोड़े के वार के साथ उन्होंने, ‘वन्दे मातरम्‌’ और ‘महात्मा गांधी की जय’ का आवाज़ बुलंद किया. इसके बाद उनके नाम में आज़ाद जोड़ा गया और तब से आज तक आजाद ही कहलाए. क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद के जन्म स्थान का नाम बदलकर अब ‘आजादनगर’ रख दिया गया है. 

आज़ाद को जब 15 कोड़ों की सुनाई गई सजा Click To Tweet

गाँधी से बेहद प्रेरित होने के बाद भी चंद्रशेखर ने खुद को उनसे अलग कर लिया. इसका महज़ दो ही कारण था. 1922 में गाँधीजी द्वारा असहयोग आंदोलन को वापस लिए जाने से खुस नही थे. दूसरा चन्द्रशेकर समझ गए थे कि अब अहिंसा से बात नही बनेगी और हथियार उठाने का समय आ गया है.

क्रांतिकारी आंदोलन उग्र हुआ, तब आजाद उस तरफ खिंचे और ‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट आर्मी’ से जुड़े. रामप्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में आजाद ने काकोरी षड्यंत्र कांड में साल 1925 में सक्रिय भाग लिया और पुलिस की आंखों में धूल झोंककर फरार हो गए. इतना सब कुछ आज़ाद ने अपने दम पर किया और कभी भी नगमस्तक नहीं हुए.

जब अपने दोस्तों के साथ करते थे निशानेबाजी

चंद्रशेखर आजाद ने कुछ क्रांतिकारी गतिविधियां के लिए झाँसी को अपना गढ़ बना लिया था. झांसी सेपंद्रह किलोमीटर दूर ओरछा के जंगलों में वह अपने साथियों के साथ निशानेबाजी किया करते थे. अचूक निशानेबाज होने के कारण चंद्रशेखर आजाद दूसरे क्रांतिकारियों को प्रशिक्षण देने के साथ-साथ पंडित हरिशंकर ब्रह्मचारी के नाम से बच्चों के अध्यापन का कार्य भी करते थे. वह धिमारपुर गांव में अपने इसी छद्म नाम से स्थानीय लोगों के बीच बहुत लोकप्रिय हो गए थे.

Last pic of Chandrashekhar Azad
Last pic of Chandrashekhar Azad

झांसी में रहते हुए चंद्रशेखर आजाद ने गाड़ी चलानी भी सीख ली थी. चंद्रशेखर आजाद का आत्म-बलिदान फरवरी 1931 को हुआ. गणेश शंकर विद्यार्थी से मिलने सीतापुर जेल गए तो विद्यार्थी ने उन्हें इलाहाबाद जाकर जवाहर लाल नेहरू से मिलने को कहा. चंद्रशेखर आजाद जब नेहरू से मिलने आनंद भवन गए और गाँधी-इर्विन समझौते पे बात हुई.

चंद्रशेखर आजाद ने चलाई गोलियां

17 दिसंबर 1928 को चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह और राजगुरु ने शाम के समय लाहौर में पुलिस अधीक्षक के दफ्तर को घेर लिया. जैसे ही जे.पी.साण्डर्स अपने अंगरक्षक के साथ मोटर साइकिल पर बैठकर निकले, राजगुरु ने पहली गोली दाग दी. जो साण्डर्स के माथे पर लगी. वह मोटरसाइकिल से नीचे गिर पड़ा और फिर भगत सिंह ने आगे बढ़कर 4-6 गोलियां दाग कर उसे मौत के घाट उतार दिया. जब साण्डर्स के अंगरक्षक ने उनका पीछा किया, तो चंद्रशेखर आजाद ने अपनी गोलियों से उसे भी भून दिया.

Chandra Shekhar Azad
Chandra Shekhar Azad

इतना ना ही नहीं लाहौर में जगह-जगह परचे चिपका दिए गए, जिन पर लिखा था- लाला लाजपतराय की मृत्यु का बदला ले लिया गया है. उनके इस कदम को समस्त भारत के क्रांतिकारियों खूब सराहा गया. चंद्रशेखर आजाद का कहना था, ‘मेरा नाम आजाद है, मेरे पिता का नाम स्वतंत्रता और मेरा घर जेल है’.

The tree Azad shot himself
The tree Azad shot himself

27 फ़रवरी को महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आज़ाद का पुण्यतिथि मनाया जाता है. आज ही के दिन चंद्रशेखर आजाद ने मातृभूमि के लिए अपने प्राणों की आहूति दी थी. 1931 में 27 फरवरी के दिन इलाहाबाद के एलफेड पार्क में अंग्रेजों से अकेले लोहा लेने के बाद उन्होंने खुद को गोली मार ली थी.

चंद्रशेखर आजाद के क्रांतिकारी विचारों से प्रभावित होकर उस समय कई युवाओं ने देश की आजादी की लड़ाई में अपना योगदान दिया. चंद्रशेखर आजाद, महात्मा गाँधी, भगत सिंह, और ऐसे सभी क्रन्तिकारी स्वतंत्रा सेनानियों को सलाम है!

‘चिंगारी आजादी की सुलगती मेरे जिस्‍म में हैं. इंकलाब की ज्वालाएं लिपटी मेरे बदन में हैं. मौत जहां जन्नत हो यह बात मेरे वतन में है. कुर्बानी का जज्बा जिंदा मेरे कफन में है.’

 

Author: Team The Rising India

Keywords: Chandrashekhar Azad, Indian Freedom Fighter, Kakori Kand, 23 July 1906, Gandhiji, Nehru, 

1 COMMENT

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here