न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा को ले कर फिर से क्यूँ मचा बवाल?

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Justice Arun Mishra Controversy feature Image
Justice Arun Mishra feature Image (Pic- BarandBench)

उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा ने पिछले दिनों राष्ट्रीय मानवधिकार आयोग (NHRC) के अध्यक्ष का पदभार संभाल लिया है. आधिकारिक सूत्रों के जानकारी मुताबिक न्यायमूर्ति मिश्रा आयोग के आठवें अध्यक्ष बने हैं. न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा को ले कर आखिर फिर से क्यूँ मचा बवाल…

पिछले साल एक कार्यक्रम में अरुण मिश्रा ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तारीफ की थी, जिसके बाद वो विवादों में घिर गए थे. उन्होंने अंतराष्ट्रीय न्यायिक सम्मेलन 2020 को संबोधित करते हुए मोदी को एक अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त दूरदर्शी और बहुमुखी प्रतिभा वाला व्यक्ति बताया था.

पिछले साल एक कार्यक्रम में अरुण मिश्रा ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तारीफ की थी. अब क्यूँ विवादों में हैं? पढ़िए पूरा… Click To Tweet

न्यायमूर्ति मिश्रा ने 150 से अधिक अप्रचलित कानूनों को खत्म करने के लिए प्रधानमंत्री और केन्द्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद की प्रशंसा करते हुए कहा था, कि मोदी के नेतृत्व में भारत अंतरराष्ट्रीय समुदाय का जिम्मेदार सदस्य है.

कब और कैसे हुई नियुक्ति?

न्यायमूर्ति मिश्रा ने 2019 में मानवधिकार सरंक्षण अधिनियम में संशोधन के बाद से इसके अध्यक्ष पद पर नियुक्त होने वाले पहले गैर पूर्व प्रधान न्यायधीश हैं. दिसंबर 2020 में पूर्व प्रधान न्यायधीश एच.यस. दत्तू का (HS Dattu) कार्यक्रम पूरा होने से एनएचआरसी प्रमुख का पद रिक्त था. एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा ने 2 जून से राष्ट्रीय मानवधिकार आयोग का अधय्क्ष पद संभाल लिया है. दो और सदस्य भी शामिल हुए हैं.

वहीं, मोदी की अध्यक्षता वाली चयन समिति ने न्यायमूर्ति मिश्रा और दो अन्य सदस्यों – इंटेलिजेंस ब्यूरो के पूर्व निदेशक राजीव जैन और जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश महेश मित्तल कुमार के नामों को मंजूरी दे दी.

जस्टिस प्रफ़ुल्लचंद्र नटवरलाल भगवती पर भी लगा था आरोप ?

जिस तरह से न्यायमूर्ति मिश्रा को सवालों के घेरे में खड़ा किया जा रहा है, उसी प्रकार पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ हुआ था.. गौरतलब है, कि आपातकाल के बाद चुनाव में सत्ता गंवाने के बाद इंदिरा गांधी ने ज़ोरदार वापसी की थी और एक दिन पहले ही प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी. अगले दिन 15 जनवरी, 1980 को इंदिरा गांधी को गर्मजोशी से भरे तमाम संदेश मिल रहे थे.

तब इंदिरा गांधी को सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस प्रफ़ुल्लचंद्र नटवरलाल भगवती ने भी अपने संदेश के दौरान उनकी तारीफ की, और उन्होंने लिखा था, “मैं चुनावों में शानदार जीत और प्रधानमंत्री के तौर पर आपकी सफल वापसी के लिए आपको हार्दिक बधाई देता हूँ. मुझे यक़ीन है कि अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति, दूरदृष्टि, प्रशासनिक क्षमता और कमज़ोरों की तकलीफ़ समझने वाले हृदय के साथ आप इस राष्ट्र को अपने लक्ष्य तक ले जाएंगी.” वहीं, जस्टिस भगवती के इस संदेश पर सवाल उठने लगे थे और कहा गया था कि ऐसी चिट्ठी से जनता का न्यायपालिका से भरोसा उठ जाएगा.

ठीक 40 साल बाद जब सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस अरुण कुमार मिश्रा ने सार्वजनिक मंच से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ़ की, तो उन्हें भी जस्टिस पीएन भगवती की तरह आलोचनाओं का सामना करना पड़ा.

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हालांकि, अब इस तरह की विवादों से प्रधानमंत्रीयों का पूराना नाता है. वही, मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष के उम्मीदवारों को चुनने वाली कमेटी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, राज्यसभा के उप-सभापति हरिवंश नारायण सिंह, लोकसभा स्पीकर ओम बिरला और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे शामिल थे.

गौर करें, कि कमेटी के पांच सदस्यों में से सिर्फ़ खड़गे ही जस्टिस मिश्रा के चुनाव के विरोध में थे. उस बैठक के अलावा उन्होंने अपनी आपत्तियां लिखित में भी पीएम मोदी को भेजी हैं.

आपत्ति क्यों आखिर ?

दरअसल, खड़गे का कहना है कि मानवाधिकार हनन के ज़्यादातर मामलों में कथित पिछड़ी जातियों के लोग, आदिवासी और अल्पसंख्यक निशाने पर होते हैं, तो आयोग का अध्यक्ष भी इन्हीं में से किसी समुदाय से चुना जाना चाहिए. लेकिन सवाल ये है कि क्या जाती के आधार पर मानवधिकार का चुनाव होना चाहिए? क्या खड़गे जातियों को निशाना बनाना चाहते हैं या फिर जाती के आधार पर चुनाव कराना चाहते हैं. हालांकि इस मसले पर खड़गे का कोई बयान सामने नहीं आ रहा है.

वहीं, जब कमेटी के बाक़ी सदस्यों ने उम्मीदवारों में ऐसा कोई नाम न होने की बात कही, तो खड़गे ने सुझाव दिया कि नए नामों के साथ एक हफ़्ते बाद भी बैठक की जा सकती है. हालांकि, ऐसा हुआ नहीं. कमेटी की ओर से नाम भेज दिए गए और जस्टिस मिश्रा की नियुक्ति भी हो गई.

अरुण मिश्रा से जुड़े विवादित मामले

सहारा-बिड़ला डायरी केस – CJI खेहर के कार्यकाल के दौरान सहारा-बिड़ला डायरी केस जस्टिस अरुण मिश्रा को सौंपा गया था. कॉमन कॉज द्वारा पेश किए गए आवेदन को जस्टिस मिश्रा खारिज कर दियाथा. उन्काहोंने कहा कि, “उच्च संवैधानिक पदाधिकारियों को महज कुछ कागजात के आधार पर जांच के अधीन नहीं किया जा सकता है”.

40 साल पहले भी जस्टिस पीएन भगवती को इसी तरह आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था. Click To Tweet

कुछ समय बाद आरोप सामने आए कि जस्टिस अरुण मिश्रा ने अपने भतीजे की शादी दिल्ली के साथ-साथ ग्वालियर में भी मनाई थी. प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सहित कई भाजपा नेता इस कार्यक्रम में मौजूद थे. सहारा स्प्रेडशीट में कथित रूप से धन प्राप्त करने वालों में से एक नाम शिवराज सिंह चौहान का भी था, जिसे आयकर विभाग ने छापेमारी के दौरान बरामद किया था.

आईपीएस संजीव भट्ट – 13 अक्टूबर, 2015 को दिए गए फैसले में, दत्तू-मिश्रा पीठ ने पूर्व भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) अधिकारी संजीव भट्ट की याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें उनके खिलाफ दर्ज दो प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) की निष्पक्ष, विश्वसनीय और स्वतंत्र जांच की मांग की गई थी. अदालत ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के अध्यक्ष अमित शाह और कई अन्य लोगों को मामले में प्रतिवादी बनाने की उनकी याचिका को भी खारिज कर दिया.

Author: The Rising India Team

Keywords: Justice Arun Mishra, NHRC Head 2021, Sahara-Birla Diary, Sanjeev Bhatt Case, 2002 Gujrat Riot, Prime Minister Narendra Modi, BJP, IPS

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