UAPA के शिकंजे से 20 साल बाद कैसे छुटे 127 मुस्लिम आरोपी ?

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Accused in UAPA, Surat court releases after 20 years
Accused in UAPA, Surat court releases after 20 years

अहमदाबाद: सुरत के एक अदालत ने UAPA के तहत 20 साल पुराने मामले में आरोपी बनाए गए 127 लोगों को बरी कर दिया है. दरअसल, इन लोगों पर दिसंबर, 2001 में प्रतिबंधित संगठन “स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (SIMI)” की एक बैठक में हिस्सा लेने का आरोप था. इन सभी को गैरकानूनी गतिविधियां के रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत गिरफ्तार किया गया था. UAPA के शिकंजे से 20 साल बाद कैसे छुटे 127 मुस्लिम आरोपी ?

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आपको बता दें, कि इन 127 आरोपियों में से 7 की सुनवाई के दौरान मौत हो गई. पांच को छोड़कर बाकी सभी जमानत पर बाहर हैं. यह पांच आरोपी अलग मामलों में फिलहाल जेल में बंद हैं.

मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट एएन दवे की अदालत ने आरोपियों को ठोस सबूतों की कमी के कारण बरी कर दिया. वहीं, अदालत ने अपने आदेश में कहा कि अभियोजन यह साबित करने के लिए ‘ठोस, विश्वसनीय और संतोषजनक’ साक्ष्य पेश करने में नाकाम रहा कि आरोपी सिमी से जुड़े हुए थे और प्रतिबंधित संगठन की गतिविधियों को बढ़ाने के लिए एकत्र हुए थे.

आरोपियों को झेलना पड़ा यातना

सभी आरोपी 11 से 15 महीना जेल में रहने के बाद ज़मानत पर रिहा हुए थे और 20 साल से मुक़दमा झेल रहे थे. इस दौरान बहुत से आरोपियों की नौकरी चली गई, कई का कारोबार बिखर गया और कुछ सामाजिक तिरस्कार का सामना करते रहे. गौरतलब है, कि गिरफ्तार लोगों में डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, शिक्षक और दूसरे अन्य पेशे से जुड़े हुए लोग थे जिन्हें इन आरोपों के कारण अपनी नौकरी गंवानी पड़ी और उनके परिवारों को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा.

इंडिया टुडे से बात करते हुए पीड़ित परिवारों ने बताया कि वह 20 साल तक मानसिक और सामाजिक यातना के साथ-साथ मुक़दमे की दुश्वारियां झेलते रहे जो बहुत ही तकलीफ देने वाला था. जिससे लोगो को मानसिक तौर पर भी पड़ताड़ना झेलना पड़ा था.

एक और पीड़ित अमजद रशीद ने बताया कि, “पुलिस यह कह कर हमें थाने ले गई कि पूछ-ताछ के बाद छोड़ दिया जाएगा. लेकिन तीन दिन तक हमें छोड़ा नहीं गया. फिर यह पता चला कि पुलिस ने हमें 14 दिन की रिमांड पर बंद किया है.”

पुलिस कस्टडी को बताया- उत्पीड़न

उनका यह भी कहना है कि पुलिस कस्टडी में काफी उत्पीड़न हुआ और धर्म विशेष को निशाना बनाते हुए सवाल पूछे गए. लेकिन क्या ये धर्म के नाम गिरफ्तारी की गई थी या फिर ये मामला वाकई सही था. ये सब अभी जांच पड़ताल की बात थी. लेकिन उससे पहले कि पुलिस ने रिमांड पर ले लिया था.

आरोपी अमजद को एक साल जेल में रहने के बाद 2002 में गुजरात हाईकोर्ट से इस शर्त पर ज़मानत मिली कि हर सप्ताह करीबी थाने पर जाकर हाजिरी देना है और मुक़दमें में हर तारीख पर उपस्थित होना है.

इस दौरन अमजद की कार्पेट कारखाने की नौकरी चली गई और दूसरी जगह काम तलाश करने में भी दिक्कत का सामना करना पड़ा.

पीड़ित परिवार ने जताई नराजगी, कहा- न्याय के इंतज़ार में बीत गए 20 साल

अन्य पीड़ित परिवारों का कहना है कि उन्हें इस बात की ख़ुशी तो है कि कोर्ट से न्याय मिला मगर दुख यह है कि इस न्याय के इंतज़ार में 20 साल की सामाजिक यातना भी शामिल है जो न्याय की ख़ुशी को कम कर देती है. वहीं, घर परिवार एक तरह से उजड़ चुका है ये कहना पीड़ित परिवार का है. 20 साल का वक्त कोई आम वक्त नहीं होता.

अपने आदेश में कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष “विश्वसनीय और संतोषजनक” सबूत पेश करने में नाकाम रहा है. यह साबित नहीं कर पाया कि आरोपी SIMI के सदस्य थे और प्रतिबंधित संगठन की गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए इकट्ठा हुए थे.

एजुकेशनल प्रोग्राम के लिए हुए थे इकट्ठा

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, कोर्ट ने माना कि आरोपी एक एजुकेशनल प्रोग्राम के लिए इकट्ठा हुए थे और उनके पास कोई हथियार नहीं था. कोर्ट ने कहा कि आरोपियों को UAPA के तहत दोषी नहीं ठहराया जा सकता.

सूरत पुलिस ने 28 दिसंबर 2001 को 123 लोगों को SIMI के सदस्य होने और शहर के नवसारी बाजार में संगठन की गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए इकट्ठे होने के आरोप में UAPA की कई धाराओं के तहत गिरफ्तार किया था. बाद में चार और लोगों को गिरफ्तार किया गया था.

पुलिस ने किया दावा, SIMI में शामिल होने के लिए मिला फॉर्म

पुलिस के दावा के मुताबिक, मौके से SIMI में शामिल होने के लिए फॉर्म, ओसामा बिन लादेन की तारीफ में किताबें और बैनर जैसे चीजें बरामद की गई थीं. लेकिन, अपने बचाव में लोगों ने कहा था कि वो SIMI से ताल्लुक नहीं रखते और सभी “ऑल इंडिया माइनॉरिटी एजुकेशन बोर्ड” द्वारा आयोजित एक सेमिनार में हिस्सा लेने आए थे.

यह लोग गुजरात, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, राजस्थान, तमिलनाडु, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों से आए थे. इन सब के बीच, आखिरकार फैसला तो हुआ, लेकिन 20 साल का समय लगा और ये वक्त काफी लंबा वक्त हो चुका है.

यब घटना कोई नई नही है

विष्णु तिवारी कि के साथ तो इससे भी बुरा हुआ. विष्णु तिवारी को 2001 में झूठे बलात्कार और 2003 में एससी / एसटी अधिनियम के आरोप में जेल में डाल दिया गया था. इलाहाबाद कोर्ट ने आरोपों को झूठा मानते हुए वर्हष 2021 में विष्णु को बरी कर दिया.

“एक बेटे के लिए इससे बुरा और क्या हो सकता है कि वह अपने मरते हुए माता-पिता के चेहरे को आखिरी बार न देख पाए?. परिवार के सदस्यों का अंतिम संस्कार करने या देखने में सक्षम नहीं होने से ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण क्या है? जेल में मैं चीखता चिल्लाता था, तुम्हारी आत्मा हर रोज दर्द से मरती है. इन 20 सालों में मैं कितनी बार मर जाना चाहता था.”

"जेल में मैं चीखता चिल्लाता था, तुम्हारी आत्मा हर रोज दर्द से मरती है. इन 20 सालों में मैं कितनी बार मर जाना चाहता था." Click To Tweet

उन्होंने कहा, “मैं अब 43 साल का हूं, मेरा लगभग आधा जीवन बीत चुका है और मेरे पास आगे देखने के लिए कुछ भी नहीं है.” विष्णु ने जेल से रिहा होने के बाद अपने दर्द को ज़माने से बयां भी नहीं कर पाता अब.

अब तक न जाने कितने ही मासूम बेगुनाह UAPA जैसे कानून के शिकार हो चुके हैं. यह पढ़ कर आप समझ सकते हैं कि हमारी न्यायिक स्थिति कितनी ख़राब है और हमे बहुत तेजी से सुधर लानेकीसख्होत जरूरत है.

Author : The Rising India Team

Keywords : UAPA, SIMI, UAPA Surat Case, 127 Muslims, Vishnu Tiwari, Rape, Indian Judiciary, FIR, Surat Court

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