“काश उस दिन पीछे मुड़कर न देखा होता”, मिल्खा सिंह …

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Milkha Singh Feature Image
Milkha Singh (Pic - Indian Exp)

भारत के ‘उड़न सिख’ यानी फ्लाइंग सिख के नाम से विख्यात महान फर्राटा धावक मिल्खा सिंह अब हमारे बीच नहीं रहे . पूरे देश के धड़कनों में हमेशा जिंदा रहने वाले मिल्खा सिंह कोरोना संक्रमण से जूझ रहे थे. पढ़ते है कि आखिर मिल्खा सिंह ने यह क्यूँ कहा था “काश उस दिन पीछे मुड़कर न देखा होता!”

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दरअसल, एक महीने तक कोरोना संक्रमण से जूझने के बाद शुक्रवार देर रात 11:30 बजे चंडीगढ़ में निधन हो गया. आजादी के बाद वैश्विक खेल मंच पर अगर किसी एक खिलाड़ी ने भारत का सिर ऊंचा किया तो वो थे मिल्‍खा सिंह.

कोरोना के चपेट में आने से निधन

जब मिल्खा सिंह कोरोना संक्रमण को मात देकर घर लौटे थे, तो ऐसा लगा था कि जिंदगी के इस दौड़ में भी मिल्खा आगे निकल गए. लेकिन कुछ ही दिनों बाद 91 साल के मिल्खा सिंह ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया.

मिल्खा 20 मई को कोरोना वायरस की चपेट में आए थे. उनके पारिवारिक रसोइए को कोरोना हो गया था, जिसके बाद मिल्खा और उनकी पत्नी निर्मल मिल्खा सिंह कोरोना पॉजिटिव हो गए थे. इससे पहले रविवार को उनकी 85 वर्षीया पत्नी और भारतीय वॉलीबॉल टीम की पूर्व कप्तान निर्मल कौर ने भी कोरोना संक्रमण के कारण दम तोड़ दिया था.

देश के पहले एथलीट थे मिल्खा

20 नवंबर 1929 को पाकिस्तान के पंजाब में जन्में मिल्खा सिंह. अब हम सबकी नजरों से हमेशा के लिए दूर चले तो गए, लेकिन अपनी सफलता के बुलंदियों की कहानी हम सबके बीच छोड़ गए. मिल्खा सिंह ने 200 मीटर और 400 मीटर की दौड़ में कई मेडल जीते.

1960 में कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीतने वाले मिल्खा सिंह आजाद भारत के पहले एथलीट थे. ट्रैक पर जब मिल्खा दौड़ते थे, तो ऐसा लगता था कि मानों कि उनके पैरों में बिजली दौड़ रही हो.

ट्रैक पर जब मिल्खा दौड़ते थे, तो ऐसा लगता था कि मानों कि उनके पैरों में बिजली दौड़ रही हो. Click To Tweet

उड़न सिख” के नाम से प्रसिद्ध थे मिल्खा

मिलखा सिंह आज तक भारत के सबसे प्रसिद्ध और सम्मानित धावक हैं. इन्होंने रोम के 1960 ग्रीष्म ओलंपिक और टोक्यो के 1964 ग्रीष्म ओलंपिक में देश का प्रतिनिधित्व किया था.

1960 में पाकिस्तानी जनरल अयूब खान द्वारा मिल्खा सिंह को “द फ्लाइंग सिख” नाम दिया गया था. 1960 के रोम ओलंपिक खेलों में उन्होंने पूर्व ओलंपिक कीर्तिमान को ध्वस्त किया लेकिन पदक से वंचित रह गए.  इस दौड़ के दौरान उन्होंने ऐसा राष्ट्रिय कीर्तिमान स्थापित किया जो लगभग 40 साल बाद जाकर टूटा. और यही नहीं उनके नाम पर कई और कीर्तिमान भी शामिल हैं.

मिल्खा सिंह का सफर

मिल्खा का जन्म 20 नवंबर 1929 को गोविन्दपुरा पंजाब में हुआ था. उन्होंने  1947 में भारत-पाक विभाजन में माता-पिता को खोया. उसके बाद शरणार्थी बन कर पाकिस्तान से दिल्ली आए. मिल्खा सिंह के कुल 14 भाई-बहन थे. मगर दंगे के पहले बीमारी से सात भाई-बहनों की मौत हो गई थी. उसके बाद दंगे के दौरान उनके माता-पिता और चार भाई-बहनों की हत्या कर दी गई थी.

1951 में सेना में विद्दुत मैकेनिकल इंजीनियरिंग शाखा में भर्ती हुए. सेना में आयोजित होने वाले मिल्खा सिंह खेल में भाग लिया और 400 मीटर की दूरी को 1 मिनट 30 सेकंड में पूरा कर मिल्खा विजेता बन गए. जिसके बाद से इतिहास के पन्नों में मिल्खा सिंह का नाम सुनहरे अक्षरों में दर्जा हो गया.

मिल्खा सिंह का अंतरराष्ट्रीय करियर

1956 मेलबोर्न ओलंपिक में मौका मिलने के बाद, मिल्खा चार बार एशियाई खेलों के स्वर्ण पदक विजेता बने. वहीं, 1958 कटक में एशियाई एथलेटिक्स प्रतियोगिता में हिस्सा लिया और 200 मीटर-400 मीटर के दौड़ में स्वर्ण पदक जीतकर कामनवेल्थ खेलों में स्वर्ण पदक अपने नाम किया. हालांकि 1960 के रोम ओलंपिक में मिल्खा सिंह चौथे स्थान पर रहे.

मिल्खा सिंह ने 1956 से 1964 के टोक्यो ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया. जिसके बाद उन्हें 1959 में पद्मश्री से नवाजा गया था. 1962 में पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने नया नाम दिया “The Flying Sikh” . तब से अब तक मिल्खा सिंह को “The Flying Sikh” के नाम से जाने लगे.

मिल्खा सिंह के संघर्ष पर बन चुकी है फिल्म

41 करोड़ की लागत से मिल्खा सिंह पर बनी फिल्म ने बड़े पर्दे पर धूम मचा दी. फिल्म सुपरहिट रही. फिल्म में फरहान अख्तर ने मिल्खा सिंह का किरदार निभाया और इस दिग्गिज धावक की जिंदगी के हर पन्ने को लोगों के सामने रखा.

मिल्खा सिंह और उनकी बेटी सोनिया सनवाका ने आत्म कथा ‘द रेस ऑफ माय लाइफ’ लिखी और इसी किताब से ‘भाग मिल्खा भाग’ प्रेरित थी. मिल्खा सिंह ने कभी भी हार नहीं मानी. हालांकि मिल्खा सिंह ने कहा था कि फिल्म में उनकी संघर्ष की कहानी उतनी नहीं दिखाई गई है जितनी कि उन्होंने झेली है.

काश पीछे मुड़कर न देखा होता !

जब भी मिल्खा सिंह का जिक्र होता है रोम ओलिंपिक में उनके पदक से चूकने का जिक्र जरूर होता है. एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, ‘मेरी आदत थी कि मैं हर दौड़ में एक दफा पीछे मुड़कर देखता था. रोम ओलिंपिक में दौड़ बहुत नजदीकी थी और मैंने जबरदस्त ढंग से शुरुआत की. हालांकि, मैंने एक दफा पीछे मुड़कर देखा और शायद यहीं मैं चूक गया.’

मैंने एक दफा पीछे मुड़कर देखा और शायद यहीं मैं चूक गया. मिल्खा सिंह आगे कहते हैं… Click To Tweet

इस दौड़ में कांस्य पदक विजेता का समय 45.5 था और मिल्खा ने 45.6 सेकंड में दौड़ पूरी की थी. मिल्खा सिंह जिस बुलंदियों पर थे, उस बुलंदियों पर पहुंचना आसान नहीं होता. आज उनके निधन पर देश के प्रधानमंत्री से लेकर देश के कई नेता,अभिनेता, खिलाड़ी आज उनको याद कर रहें हैं.

Author : The Rising India Team

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  1. […] देश में आजादी की लड़ाई का पहली बार शंखनाद करने वाले अमर शहीद मंगल पांडेय की आज 194वीं जयंती है. पूरा देश आज मां भारती के उस वीर सपूत को याद कर रहा है. जो देश के लिए हमेशा से गौरव महसूस कराया. एक ऐसा वीर सपूत जो देश के लिए, ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ पहली सशस्त्र क्रांति का बिगूल फूंका था और वीरगति को प्राप्त हुए थे. ‘मारो फिरंगी’ का नारा, फांसी और अमर शहीद मंगल पांडेय को जानते हैं! […]

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